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पंजाब-हरियाणा

कैप्टन की सूझबूझ किसान और कांग्रेस दोनों को कर रही मजबूत ।


धर्मपाल वर्मा
चंडीगढ़ 
हाल के तीन कृषि कानूनों को लेकर जो आंदोलन चल रहा है बेशक उसकी शुरुआत हरियाणा में पिपली कस्बे से भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढूनी के नेतृत्व में 10 सितंबर को हुई थी परंतु किसानों के दिल्ली कूच के ध्वजवाहक पंजाब के किसान बने। उन्होंने 500 किलोमीटर से भी अधिक की दूरी और बीच रास्ते में आई बाधाएं तोड़ी किसी मामले में दूसरों पर निर्भर नहीं रहे और हरियाणा के किसानों को भी लामबंद करने का काम करके दिखा गए परंतु पंजाब के किसान ने हर जगह हर तरह से जिस तरह अपने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की तारीफ की है वह उनके इस  इस मामले में सूत्रधार होने का प्रमाण देती है ।

मतलब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी सियासी सूझबूझ से ऐसा काम करके दिखा दिया कि लोग अभी से यह कहने लगे हैं कि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कई साल पहले ही पंजाब का अपना अगला चुनाव जीत लिया है ।

 उन्होंने किसान को एकजुट करने के अलावा संघर्ष करने के लिए उन्हें प्रेरित किया, अपने विरोधियों को लपेट दिया और कांग्रेस को भी मजबूती प्रदान करने में सफलता हासिल की है । आज स्थिति यह है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री समेत भाजपा के नेता बैकफुट पर नजर आने लगे हैं । यह कैप्टन अमरिंदर सिंह की कूटनीति है कि एक राज्य का मुख्यमंत्री होते हुए भी उन्होंने पूरी भारतीय जनता पार्टी को एक तरह से चुनौती देने का काम कियाऔर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की भी सहानुभूति बटोरने में सफल हुए हैं। 

आज हरियाणा का किसान भी यह समझ रहा है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले दिनों जिस तरह से पंजाब के तेजतर्रार नेता नवजोत सिंह सिद्धू को अपने घर लंच पर बुला गिले-शिकवे मिटा देने का संदेश दिया है उससे पंजाब में ही नहीं कई जगह भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं और कांग्रेस कुछ नया करने की स्थिति में आ सकती है। इसका मूल मंत्र यह है कि यदि लोगों ने कांग्रेस को ही भाजपा का विकल्प मान लिया तो स्थिति बदल जाएगी और किसान वर्ग खुल कर कांग्रेस के पक्ष में खड़ा हुआ तो अभी से राजनीतिक स्थितियां बदल जाएंगी। इस आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि केंद्र सरकार किसानों की एक व्यवहारिक मांग या तो किसी दबाव में नहीं मान रही है या उसका कोई हिडन एजेंडा है। जहा तक भारत सरकार और भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, वह इन कानूनों के मामलों में किसानों की तसल्ली नहीं करा पाई है।

 पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने राज्य की जनता को यह संदेश देने में भी सफल रहे हैं कि केंद्र की मोदी सरकार हर मामले में पंजाब की उपेक्षा कर रही है और इससे पंजाब में सरकार की परेशानियां बढ़ रही हैं । उन्होंने ऐसा काम भी कर दिखाय कि इन्ही बिलों को लेकर केंद्र सरकार से त्यागपत्र देने वाली हरसिमरन कौर बादल की पहल भी उनके काम नहीं आ रही और ऐसा लगता है कि किसानों ने प्रकाश सिंह बादल के परिवार को एक तरह से दरकिनार कर दिया है । देखा जाए तो कैप्टन अमरिंदर सिंह उनके नायक के रूप में नजर आ रहे हैं।

पंजाब के लिए यह कोई नई बात नहीं है। अपने हितों की लड़ाई लड़ने में पंजाब के लोग और उनके नेता हरियाणा के मुकाबले में सदा से संजीदा रहे है। सारे हरियाणा को याद है कि हरियाणा के हक में एसवाईएल को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किस तरह विधानसभा में प्रतिकार किया था और हरियाणा को पानी साझा  करने से साफ मना कर दिया था । उस समय हरियाणा-पंजाब में भी और केंद्र में भी कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थी। पंजाब के मुख्यमंत्रियों की बात करें तो प्रकाश सिंह बादल ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से एसवाईएल नहर को आटने मतलब अधिग्रहण के बावजूद किसानों को उक्त जमीन को वापिस कब्जाने का फरमान जारी कर दिया था । 

लंबे समय से एसवाईएल का यह मुद्दा एक तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और अब ऐसा लगने लगा है कि हरियाणा के सामने मुंह ताकने के सिवाय कोई चारा ही नहीं रह गया है । यद्यपि अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और फैसले की प्रतीक्षा की जा रही है।

आज अगर हम हरियाणा और पंजाब के हितों की सुरक्षा की बात करें तो पंजाब कि लोगों ने उसके कोई मुख्यमंत्रियों ने खुद को 21 साबित किया है। 1970 में चंडीगढ़ के मसले पर पंजाब का पलड़ा भारी रहा। चंडीगढ़ पर दोनों प्रदेशों का दावा था हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल हुआ करते थे । 

तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी के दरबार में उनकी तूती बोलती थी। सारा देश मानता था कि श्रीमती गांधी चौधरी बंसीलाल की बात सबसे अधिक मानती है । उस समय भी पंजाब के लोग यह प्रावधान कराने में सफल रहे थे कि बेशक चंडीगढ़ दोनों राज्यों की सांझी राजधानी होगी परंतु चंडीगढ़ का एडमिनिस्ट्रेटर वही होगा जो पंजाब का गवर्नर होगा। हरियाणा के गवर्नर को चंडीगढ़ के मामले में ऐसा कोई अख्तियार नहीं है जो पंजाब के गवर्नर को है । यह पंजाब के लोगों की जीत ही कही जा सकती है।

पंजाब के लोग राजनीतिक मामलों में भी अपनी शर्तों पर फैसले करते हैं। हरियाणा में आमतौर पर लोग केंद्र में आई सरकारों के हिसाब से विधानसभा में वोट डालते हैं । जैसे ऊपर भाजपा की सरकार बनी तो वे नीचे भी बना देते हैं लेकिन पंजाब के लोग अमूमन ऐसा नहीं करते। आपने देखा होगा कई बार ऐसा हुआ है कि ऊपर कांग्रेस की सरकार बनी तो पंजाब के लोगों ने नीचे अकाली दल  की सरकार बनाई । ऊपर भाजपा का शासन हुआ के नीचे कांग्रेस की सरकार बनाई । अब भी ऐसा ही है।

यह समझा जा सकता है कि इस समय जहां कांग्रेस मैं कमजोरी नजर आ रही थी ,पंजाब में भी कांग्रेस में थोड़ी गुटबाजी दिख रही थी मौजूदा आंदोलन ने उन परिस्थितियों को बदल दिया है ।
आज कांग्रेस इसलिए मजबूत नजर आ रही है कि किसानों ने ही यह संकेत देना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस ही भाजपा का विकल्प हो सकती है । पिछले दिनों पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पार्टी की फूट की खबरों पर विराम लगाते हुए पंजाब के कांग्रेस के टकसाली और तेजतर्रार नेता नवजोत सिंह सिद्धू को अपने घर बुलाया उनके साथ भोजन किया और नई रणनीति बनाकर विरोधियों को चित कर दिया ।

 यद्यपि इस प्रगति में कांग्रेस के पंजाब के प्रभारी उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की अहम भूमिका है परंतु इससे लाभ तो कांग्रेस को ही हुआ है। कैप्टन अमरिंदर सिंह को लेकर पूरी कांग्रेस मैं मान्यताएं बदल रही है ।उनके लिए यह बहुत खास बात है।कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साबित कर दिया है कि वे राजनीति में माहौल बनाना जानते हैं और माहौल बनाना ही राजनीति है। 

इसलिए अब यह कहा जा सकता है कि  दिल्ली कूच का फैसला पंजाब के किसानों ने अपने दम पर लिया था परंतु आज उस मुहिम में हरियाणा ही नहीं उत्तर प्रदेश उत्तराखंड राजस्थान और दिल्ली का किसान भी शामिल हो गया है। इतना बड़ा विरोध शायद ही भारत में कभी हुआ होगा। 

वैसे सूचना मिली है कि गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को आज दिल्ली बुलाया है देखते हैं इस मुलाकात का क्या नतीजा निकलता है।

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