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भारत

डर मोदी से नहीं झूठ से लगता है साहेब

 

      मंदिर, मूर्ति, तीन तलाक, धारा 370 बीजेपी के सबसे बड़ी उपलब्धि है। जिसे वो देश को सौगात के रूप में प्रचारित कर रही है, इसे बीजेपी अपनी जीत मान जश्न मना रही है, गलत भी नहीं किसी दल का जश्न में मशगूल होना। पर जनता के हिस्से में क्या आया? सवाल लाजमी है 2014 के बीजेपी के घोषणापत्र पर 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' था जिसकी आत्मा हिंदुस्तान सर्वोपरि समझ आया, जो 2019 में 'मोदी है तो मुमकिन है', पर सिमट गया राष्ट्रवाद पर व्यक्तिवाद का ऐसा यूटर्न पहले कभी नहीं देखा गया।
     मोदी है तो मुमकिन है कि पड़ताल 2020 की विदाई पर करते हुए देखे तो लगता है झूठ ज्यादा और सच की भारी किल्लत है। काला धन लाएंगे इस वायदे की कालिख से कांग्रेस को घेरने वाले आज खुद उसकी गिरफ्त में खड़े हैं। सौ स्मार्ट सिटी के स्वप्न को उंगली डाल डाल कर जन-जन की आँखों में घुसाने वाले एक स्मार्ट सिटी की हकीकत बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। 8 नवंबर 2016 को रात आठ बजे पचास दिन की मोहलत मांग एलाने नोटबंदी कर, अगर सब कुछ बदल न जाए तो चौराहे पर फांसी दे देना कहने वाले क्या कुछ नोटबंदी से बदल पाए ये झूठ भी देश जान गया है। उनकी कलई खुल गई है। महंगाई को डायन बता डरावने बयान देने वालों ने कांग्रेस से कुर्सी छीन जबसे सत्ता पाई है, महंगाई बेलगाम हो इनके सर पर नाच रही हैं, महंगाई डायन की ताता-थैया अब इन्हें लुभाने लगी है। पेट्रोल, डीजल, सब्जी हर वस्तु की कीमत पर जो जबरदस्त उछाल है क्या ये अच्छे दिनों की अच्छी सौगात है? दो करोड़ रोजगार हर साल देने का ढींढोरा जोर जोर से पीट शोर मचाने वालों से सवाल पूछता है भारत कि पूरे छह साल में भी कुल दो करोड़ रोजगार दे पाए कि नहीं यह बता रही है बेरोजगारों की इतनी लंबी कतार जो हिंदुस्तान ने पहले कभी नहीं देखी।
     मोदी है तो मुमकिन है रेस कोर्स रोड का नाम, योजना आयोग का नाम, रेलवे स्टेशन, प्लेटफार्म, शहरों, सड़कों, योजनाओ के नाम बदलने के अलावा क्या बदला? पूछते ही आप मानो देशद्रोही होने का कोर्स पूरा कर लेंगे। क्योंकि 'सबका साथ सबका विकास' वाले नेता के नेतृत्व में मन की बात करने की इजाजत सिर्फ उन्हीं के हिस्से आती है। न कोई पूछेगा, न कोई और बोलेगा, ना ही कोई और बताएगा कि मुमकिन क्या हुआ? सच यह दौरे सर्टिफिकेट का है जहां देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग, पाकिस्तानी, खालिस्तानी, अवार्ड वापसी गैंग में शुमार कर सच बोलने वालों को ठप्पा लगा बिना समय गवाएं सर्टिफिकेट तामिल करा दिए जाते हैं।
      बिहार की चुनावी सभा याद ही होगी, बोलो कितना दूं दस हज़ार करोड़, बीस हज़ार करोड़, पचास हज़ार करोड, चलो एक हज़ार करोड़ दिए, क्या वो करोड़ों रुपए बिहार वासियों के खाते में आ गए, खाते में तो 15 लाख भी नहीं आए साहेब। खाते से गए कितने? पंजाब नेशनल बैंक, नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या जैसे पलायन वादियों की पोटली का वजन यह बता ही देंगे। 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' एक नारा था मित्रों उस नारे की हकीकत बताने के लिए हर दो-दो घंटे में एक बलात्कार की उत्तर प्रदेश की  भयंकर तस्वीर ही बयां करने को काफी है। थाली और ताली बजा कोरोना की विदाई कराने वाले साहब अपनी नाकामी का ठीकरा कब तक नेहरू गांधी पर फोड़ बचते छुपते रहेंगे? किसानों का डेरा दिल्ली का घेरा बन रात दिन दहाड़ रहा है। उम्मीद आधी है आधी अभी बाकी है, मन की बात से पेट नहीं भरता साहब, जन की बात से देश चलता है। किसी नायक की तरह आप का उदय हुआ था, आज स्थिति क्या है? कैसी है? समझ गया है हिंदुस्तान। गुजरात के एक लेखक जेआर शाह ने कुछ साल पहले ही एक किताब लिखी थी 'फेंकू हवे दिल्ली मा' जो प्रकाशित हुई पर बिकने की आजादी शायद नहीं मिली। मिला क्या हमें  पकौड़ा, जुमला, ये झूठे नारे नाम कब तक? वह इंडिया, पुराना इंडिया, नया इंडिया के नारों से की भरमार चलती रहेगी। कब सच वायदों का इंडिया आएगा? वायदा कब सच साबित होगा इंतजार है। वायदों की इस भायनक भीड़ में झूठे वायदों का जंगल उग गया है और यह झूठ का जहरीला जंगल देशवासियों को डराने लगा है। सच है डर मोदी से नहीं झूठ से लगता है साहेब। 

संदीप मिश्रा

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