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पंजाब-हरियाणा

हक हल हठ सब डट गए है


         जाते-जाते बीस बीस ऐसी टीस दे गया,जिससे पार पाना इक्कीस के बस की बात नहीं लगती। बादल उमड़-घुमड़ रहे हैं, बिजली चमक रही है, किसान दहाड़ रहा है, और धरने का पहाड़ हर दिन पहले से ज्यादा बढ़ता ऊंचा उठता नज़र आ रहा है। राशन पानी लेकर दिल्ली को घेरे बैठा किसान अब लाल किला कूच करने की तैयारी में है। पहले ट्रैक्टर पर सवार हो वह सड़कों को नापेगा, स्थिति को भापेगा, फिर आगे की राह तलाशेगा। वार्ता के सात दरवाजे पर होने के बाद भी समझौते का खजाना नहीं मिला, मिली तो बस तारीख जो फिर आठवे दौर के लिए तय कर दी गई है। किसान ने तो ऐलान कर दिया है कि तीनों कानून वापसी ही एक मात्र विकल्प है, किसान संगठनों का फैसला सरकार के सामने हैं, हां या ना कि बात है और दोनों ही शब्द सरकारी मुंह से बोले जाने है। शुभ मुहूर्त कब आएगा? कब किसान सड़क, सरहद,शहर छोड़ घर वापसी करेंगे? इस बात का निर्णय भी सरकार की हां या ना पर ही निर्भर करता है।
   
   सरकार इस कानून को किसान के लिए सौगात बता बिंदु दर बिंदु इस बिल के फायदे समझाने की जिद्द पर जद्दोजहद कर रही है, तो दूसरी ओर किसान इसे आत्मघाती काला कानून, गले की फांस, खेतों पर कब्जा, पूजीपतियों के चाल बता इस कानूनी जाल के जंजाल से खुद को बचाने की निर्णायक मुहिम में अविचल अडिग खड़ा है। मंत्रियों की टोली, किसानों का दल, विज्ञान भवन की कुर्सीया, गुरुद्वारे का लंगर, बसों से उतरना चढ़ना पिछले चालिस दिनों में हिंदुस्तान के हिस्से देखने को बस इतना ही मिला है। इस बीच हर सोलह घंटे में एक किसान अपने प्राण की आहुति दें इस अभूतपूर्व किसान यज्ञ में अपना सर्वस्व निछावर कर  इस लोक से परलोक गमन कर रहा है। किसानों की  शहादत का ये दर्द कराह बन चीत्कार रहा है,दिलों को साल रहा है, बेदना उफान मार रही है और समझौते की राह नजर नहीं आ रही आखिर कब तक किसान सड़क पर अपनी ही चादर को कफन बना मौत की बाहों में लिपट कर सिमटता रहेगा।
      
      किसान अपने खेतों की आजादी,फसल की सुरक्षा और न्यूनतम कीमत की ही तो मांग कर रहा है। उधार के खाद, बीज, कीटनाशक खरीद वह पहले ही दिन से ब्याज का भुगतान देता है ,और अपनी फसल को अपने ही ट्रेक्टर ट्राली पर लाद  उधार बेचने को भी मजबूर है। यह उसके लिए दोहरी मार है बैक के ब्याज का बोझ और उधार खाते में बिकी फसल जिसकी वजह से ही वह फांसी के फंदे और सल्फास की गोलियों पर आ सिमटता है आत्महत्या को विवश होता है। किसान को तो यह भी नहीं मालूम उसके फसल की कीमत क्या होगी? उसे इतना भी पूछने का तो हक नहीं है। मीलो से मिली कलाल पर्चियां इस बात की तस्दीक करने को काफी है, जिसमें गन्ने का वजन दर्ज है, बेचने की तारीख भी दर्ज है,पर दाम क्या होगा इस भाव वाले खाने  पर शून्य लिखा है। दुर्भाग्य ये है कि भुगतान कब होगा इस बात की तो पर्ची में लकीर तक नहीं खींची गई है। किसान की तकदीर के साथ ये घिनौना खेल वर्षों से जारी है।  जबकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश है कि भुगतान अगर 14 दिन बाद भुगताना नहीं होता तो ब्याज सहित राशि किसानों को देनी होगी। जनप्रिय प्रचंड बहुमत की सरकार के मुखिया माननीय प्रधानमंत्री ने भी चुनाव में उत्तर प्रदेश की धरती पर किसानों से वादा किया था कि 14 दिन में किसानों के खाते में हर हाल पैसे आ जाएंगे। सर्वोच्च न्यायलय के न्याय का सम्मान होगा समय पर भुगतान करेंगे बस सरकार बना दो। चुनाव खत्म वायदा खत्म ये बात तो हमे समझ आती है, पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी किसानों को हक नहीं मिलेगा यह बात गले नहीं उतरती।
   
     किसान बारिश,ठंढ, गाली,गोली,बौछार, मौत सब का सामना करते हुए भी अपने हक के लिए हाल टेक सड़क पर आ बैठा है। हठ का छाता ले सरकार भी कानून वापस न लेने की पर अड़ी खड़ी है। अब राम ही जाने क्या होगा अंजाम?  जब हक हल हठ सब डट गए हैं।
 संदीप मिश्र

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