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भारत

भारत निर्माता भारत रत्न

 

शिक्षक से संस्थान तक, महामना एक रूप अनेक 

    जिसके राज में सूरज नहीं ढला कभी, उस शासक के आंगन से माँ भारती का सूर्य दिवाकर बन ले आए महामना। शक्ति का संचार, शिक्षा का संस्थान, धर्म का संस्कार, विचार का आकार, सेवा का संसार, न्याय का उद्धार, समाज की चेतना कलम की संवेदना, ज्ञान की मशाल, गर्जना की मिसाल, गंगा का पुत्र, राज का बलिदानी अद्भुत अनुपम आदित्य महाज्ञानी कलम कांप रही है, शब्द बिखर रहे हैं, स्याही साहस नहीं कर पा रही, कागज बेचैन है... गाथा महामना की लिखना संभव कहाँ? कहाँ से शुरू करें? क्या क्या लिखें? कश्मकश में है कलम
    लिखने बोलने समझने का यंत्र शिक्षा है यही महामना का प्रिय मंत्र था। मदन मोहन मालवीय के साँसों के सफर की शुरुआत उस धरा से हुई जहाँ गंगा यमुना सरस्वती का मिलन होता है उसी पुण्य भूमि प्रयाग से उदित हुए मदन मोहन अंग्रेजों के कैलेंडर के अनुसार वह बड़ा दिन था, जो काल के कपाल पर सदा सदा के लिए अमर हो गया 25 दिसंबर 1861 कि वह पुण्यतिथि जो स्वयं को धन्य करने के लिए मालवीय जी के जन्म की तारीख बनी। कला, कौशल, कुशलता, कुशाग्रता विरासत में मिली बालक मदन को साथ ही निर्धनता की कठोरता भी। गरीबी की परवाह किये बिना गुणो के दम पर ब्रह्म समेटने आगे बढ़ मदन महामना कहलाये। विरासत में मिली श्रेष्ठता को श्रेष्ठतम कर उसे इतनी ऊंचाई प्रदान की जिसके सम्मुख नभ भी झुक कर अभिनंदन करता है। यह  सिलसिलेवार लिखने का प्रयास है जीवन कैसे वरदान बन सकता है? महामना का आचरण इसका साक्षात् प्रमाण है ।
   
शिक्षार्थी से शिक्षक
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    सत्य है पहली नौकरी 1824 में बतौर सहायक अध्यापक से शुरू की और संकल्प 'सत्यमेव जयते' को जन-जन की आवाज बनाना था। सदियों पहले वेद वर्णित इस वाक्य को भारत की जमीन पर इतना लोकप्रिय कभी कोई नहीं कर पाया जो महामना के शब्दों की जादूगरी कर गई पढ़ाते रहे जिम्मेदारी के लिए पढ़ते रहे ज्ञान की अविरल धारा बहाने के लिए अध्ययन अध्यापन का साथ साँसें टूटने तक कोई तोड़ न सका। उस कालजयी संबंध के अनुबंध को न चिता की अग्नि जला सकी न मौत मार सकी न दूरी उसे मिटा सकी न समय उसे भुला सका। वह मजबूत जोड़ आज भी जस का तस जुड़ा ही है।

पत्रकारिता
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    बुद्धि का वेग, कलम का तेज, शब्दों की श्रृंखला, वेदना की समझ उमड़ घुमड़ कर उन्हें पत्रकारिता की दिशा की ओर ले कर बह चली। हिंदुस्तान टाइम से सफर की शुरुआत और फिर 1924 से 1946 तक संस्थान के चेयरमैन रहते हुए ना सिर्फ अखबार को नई पहचान नई जमीन दी उसे बचाए, बनाये, बढ़ाए रखा वरन दैनिक हिंदुस्तान की 1936 में शुरुआत भी की इंडियन यूनियन, अभ्युदय, मर्यादा जैसे नामचीन अखबारों का मालवीय जी ने संपादन किया और 1909 में द लीडर नामक अखबार की स्थापना भी की। पत्रकारिता के साथ कानूनी शिक्षा अर्जित कर न्याय के मंदिर में महामना न्याय की वह मिसाल बने जिसके आसपास कभी कोई लौ नहीं पहुँच पाई।

वकालत
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    सन् 1891 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से बतौर वकील न्याय के मंदिर से सफर की शुरूआत की। तर्क तथ्य तैयारी की ऐसी कड़ी बने मालवीय कि जिसका केस लड़े उसकी हथकड़ी खुल गई मौत पीछे हट गई। वकालत को छोड़ महामना राजनीति का रुख कर चुके थे, बात 1922 की है चोरा चोरी कांड सामने आया। चोरा चोरी गांव में अंग्रेजों की चौकी को ग्रामीणों ने आग के हवाले कर दिया था निर्दयी  शासकों ने 170 क्रांतिवीरो पर जुल्म किया, मुकदमा दर्ज हुआ और निचली अदालत ने सभी को सजा-ए-मौत फाँसी का आदेश दिया। फाँसी के मुहाने तक पहुँचे राष्ट्रभक्तों की टोली की बात आँखों को नम कर रही थी। देशभर में शोक की लहर थी उम्मीद भरी 35 करोड़ भारतीयों की 70 करोड़ आँखों में महामना एक मात्र उम्मीद बन बस गए। आखिर महामना ने क्रांतिकारियों के केस की पैरवी की हामी भर दी। चोरा चोरी केस की फाइल हाथों में थाम ली और न्याय के मंदिर में पेरोकार बन सरकार के सामने जा खड़े हुए। जब तर्कशक्ति, वाकपटुता, न्याय विद्या आधार बना तथ्य और तर्क के तीर चले तो न्याय की गद्दी पर बैठे न्यायमूर्ति डॉ ग्रीमवुड मेयर्स आश्चर्यचकित हो गए। न्याय के ऐसे प्रतिवादी को देख वह मंत्रमुगध हो गये, बीच बहस में न्यायमूर्ति एक बार दो बार नहीं बल्कि तीन-तीन बार खड़े होकर बतौर वकील पेश हुए मदन मोहन मालवीय का अभिवादन किया। यह न्याय की दुनिया में एक अद्भुत अमूल्य अनुपम अद्वितीय उदाहरण है कि न्यायाधीश न्याय के याचक का अभिवादन बाहें पसार कर करें। आखिर वह ऐतिहासिक फैसला सबके सामने आया जिसमें 170 लोगों की मौत की सजा टाल दी थी 153 लोग आजाद हो गए बाकी को उम्र कैद मिली न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में लिखा "जिस योग्यता से आपने मुकदमे की पैरवी की है, उसके लिए सभी अभियुक्त आपके ऋणी रहेंगे। आपको इस मुकदमे की इतनी शानदार तरीके से पैरवी करने के लिए मुबारकबाद देता हूं।" जस्टिस ग्रीम वुड मेयर्स

राजनेता
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    उनके भाषण की कला लोगों को बरबस आकर्षित कर लेती थी, उनके शब्दों की शैली में लोग खो जाते थे उनके भाषण में तेज गति दिशा सब का समावेश था उनके शब्दों की उर्जा इतनी ऊर्जावान थी कि संपूर्ण भारत की छवि उसमें साकार होती थी तभी तो दादा भाई नौरोजी ने कहा था "इस युवक की वाणी में हम भारत मां की उपस्थिति का अनुभव कर पाते हैं।" देश की आस कांग्रेस ही थी, क्रांतिवीरो से भरी क्रांति के सूत्र में बंधी आजादी की आत्मा के बोल कांग्रेस पार्टी के प्रणेता रहे मदन मोहन मालवीय। वो कांग्रेस के इतिहास मे एकमात्र ऐसे नायक रहे जिन्होंने चार चार बार कांग्रेस का नेतृत्व किया । 1909 लाहौर की ललकार 1928 और 1930 में दिल्ली की दहाड़ और 1933 में कोलकाता की वाककुशलता कांग्रेस अध्यक्ष के रुप मे मालवीय को पूरे हिंदुस्तान ने देखा समझा और अनुसरण किया। वह निर्विवाद नेता सदा सर्वप्रिय रहे दल, देश, धर्म, संप्रदाय, समुदाय से ऊपर सबके मन का मान राजनीति का सम्मान सदा बने रहे।  मानवमूल्य उनका मंत्र रहा मानवता से बड़ी कोई सेवा नहीं मानव मूल्य को आदर्श मान राजनीति का सितारा बने रहे और आने वाले सदियों तक बने रहेंगे उनके बारे में गांधी जी ने कहा था मैं उनके निर्मल धारा में गोता लगा तर जाना चाहता हूँ। मेरे चरित्र में दाग हो सकते हैं पर उनके चरित्र में दाग नहीं हो सकता वह प्रातः स्मरणीय हैं वंदनीय हैं। मालवीय खुद कहते थे "मैं जाति और संप्रदाय को मानवीय मूल्यों से ऊपर नहीं समझता सच्चा देवत्व तो मानवीय मूल्य को अपनाने में है।" महामना यह भी कहते थे कि "एक जिसने अपने साथ भलाई की उसके साथ भलाई करना तो आसान है, बड़प्पन तो इसमें है कि जिसने आपके साथ बुराई की है उसके साथ भी भलाई करें। यही हिंदू धर्म का सार है।"

    उनके बारे में महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिवीरों ने जो कहा वह शायद यह कभी किसी के बारे में कहा गया हो 

गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा "हृदय और भाव की कोमलता की दृष्टि से मालवीय जी से बढ़कर शायद ही कोई दूसरा हो।" 

दादा भाई नौरोजी "इस युवक की वाणी में हम भारत मां की उपस्थिति का अनुभव कर पाते हैं।"

लाल बहादुर शास्त्री "मालवीय जी नैतिकता के पुजारी थे, सच तो यह है कि वह जहाँ भी जाते अपनी नैतिकता के कारण ही सर्वोच्च सम्मान पाते थे।"

डॉ एस राधाकृष्णन "मालवीय जी में हम दो महान गुणों का अद्भुत संयोग पाते हैं, भगवान कृष्ण का योग बल व स्फूर्ति और अर्जुन की व्यावहारिकता वे सच्चे कर्म योगी हैं।"

महात्मा गांधी "मेरे विचार में मालवीय जी से बढ़कर कोई दूसरा देशभक्त नहीं है, मैं तो उन का पुजारी हूँ।"

पंडित नेहरू "हमारे महान राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान मालवीय जी भारत के राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के महामानव थे। हम सभी ने उनके महान व्यक्तित्व से प्रेरणा ली इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने देश की अनुपम सेवा की और अपने संपर्क में आने वाले असंख्य लोगों पर जबरदस्त प्रभाव डाला। उचित नहीं होगा कि हम स्वाधीनता के भवन की नींव रखने वाले इस महान नेता को श्रद्धांजलि दें, वह भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन स्वतंत्र भारत के पूर्ण निर्माण में सदा जीवित रहेंगे काश हम उनके योग्य उत्तराधिकारी बन सके"।

सरोजिनी नायडू "पंडित मालवीय जी की महानता  असंदिग्ध है, उनकी मृदुता और शिष्टता बेजोड़ है। अंदर तक हिंदू हैं, राष्ट्रवादी हैं और एक महान व्यक्ति हैं।

एनी बेसेंट "मैं कह सकती हूँ कि आज तमाम मतभेदों के बीच पंडित मालवीय भारतीय एकता के प्रतीक हैं"।

संस्थापक
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 शिक्षा ही विकास की मशाल है, शिक्षा अंधियारा मिटा उजाला का स्रोत ला सकती है। शिक्षा इतिहास के गौरव भविष्य की चुनौती का सामंजस्य हो इसी उद्देश्य के साथ आशा और प्रकाश का एक दीप सरस्वती मां के आंगन में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में उन्होंने जलाया। इस महान शिक्षा संस्थान का महत्व महात्म इस बात से ही जाना जा सकता है कि देश के सात भारत रत्न इसी विश्वविद्यालय परिसर से कि शिक्षार्थी रहे। बीस पदम सम्मान से अलंकृत महान भारत विभूति भी इसी संस्थान के शिक्षार्थी रहे। दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित भूपेन हजारिका व ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित काशीनाथ सिंह काशी के दिल में बसे मालवीय के सपनों के शिक्षा मंदिर के वो पुष्प है जिसकी सुगंध से भारत महक रहा है। शिक्षा के इस मंदिर को बनाने के लिए हैदराबाद के निजाम की चप्पल नीलाम से लेकर काशी नरेश से भूदान तक के किस्से मालवीय जी की तप, त्याग, तपस्या, तत्परता के प्रेरक प्रसंग के रूप में प्रसिद्ध ही है। राष्ट्रीय गुरु महामना की महानतम कृति बनारस हिंदू विश्वविद्यालय है जिसकी निर्माण के लिए जब वह धन मांगने जाते थे तो बृज नारायण चकवात की यह पंक्तियां बोलते थे 
"जरा हमैयतो गैरत का हक अदा कर दो
फकीर कौम से आए हैं झोलियां भर दो।"

गंगा पुत्र
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मां गंगा पर जब अंग्रेजों ने बांध बनाने की योजना तैयार की तो मालवीय जी से ना रह गया, वह अंग्रेजी हुकूमत को ललकारने हरिद्वार जा पहुंचे । मां गंगा के धारा की अविरलता का महत्व, मां गंगा का महत्व, गंगा में भारतीयता के निष्ठा, और भारत के लिए गंगा वरदान पर इस तार्किक ढंग से अंग्रेजो को घेरा की मां भागीरथी की अविरल धारा हरिद्वार से प्रयाग तक बह निकली। अंग्रेज चाह कर भी उसे रोक ना पाए बाँध न बना पाये। मालवीय जी ने 1905 में गंगा महासभा की स्थापना की जो आज भी मां गंगा की सेवा में समर्पित जीवित आरती है।

दलित उद्धार
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    यरवदा जेल में गाँधी जी ने अन्न त्याग दिया था। उनके मन में दलितों के साथ हो रहे भेदभाव की टीस थी। महामना महात्मा से मिलने यरवदा पहुंचे, मोहन  को मदन ने वचन दिया और हरिजन सेवक संघ की स्थापना की कट्टर पंडितों ने महामना का घोर विरोध किया, लेकिन महामना कहाँ मानने वाले थे? मालवीय जी ने मानवता को महामंत्र मान दलित समाज के साथ न सिर्फ मंच साझा किया बल्कि उन्हें मंत्र दीक्षा भी दी। वे कहते थे।" मैं जाति और संप्रदाय को मानवीय मूल्यों से ऊपर नहीं समझता, सच्चा देवत्व मानवीय मूल्यों को अपनाने में है"।
 
कुशल वक्ता
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    भाषण संभाषण शब्द संसार पर महामना जैसी पकड़ शायद ही किसी और की रही हो। दादा भाई नौरोजी ने कहा था कि "इस व्यक्ति की वाणी में भारत मां के साकार होते हैं"। जलियांवाला हत्याकांड पर जब जनरल डायर को क्षमादान देने के लिए अंग्रेज सरकार ने प्रस्ताव बनाया उसके विरोध में महामना मदन मोहन मालवीय ने 5 घंटा लंबा भाषण दिया जो राजनीतिक गलियारे में अब भी अधिक चेतना का पुंज बना खड़ा है। 1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में अंग्रेज सरकार भारत की आवाज दबाने और जिन पर शासन किया जा रहा है उनकी राय उनके विचार जानने की समझने की जोर दार वकालत आज भी सराहनीय है। उद्योग नीति पर उनका साफ कहना था स्वदेशी उत्पादों को उद्योगों को बल मिले स्वदेशी उत्पादों की खरीद हो और स्वदेशी बाजारों को बढ़ावा मिले। आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न मालवीय जी ने आजादी से पहले ही स्थापित कर दिया था। 
     समर्पित देश भक्त, दूरदर्शी शिक्षाविद, संवेदनशील समाज सुधारक, निर्भीक विद्वान, धर्म परायण हिंदू धर्म के प्राण, अद्भुतवक्ता महामन शिक्षक से संस्थान तक महानता कि वह पराकाष्ठा है जिसका कोई सानी नहीं है। वो आज भी हमारे बीच हैं और तब तक रहेंगे जब तक कि दीन दुखियों का कष्ट न मिट जाए। वह कहते थे" मेरी एकमात्र इच्छा है मैं बार-बार जन्म लूं, जब तक मैं हर व्यक्ति का को दुख से छुटकारा ना दिला दूं अंधेरा हटा प्रकाश में ना भेज दूं"। मैं तो बस इतना ही कहता हूँ मालवीय जी का जीवन वेद रामायण गीता का सार है मालवीय जी को पढ़ लेना ही उनको जान लेना ही इन महान ग्रंथों को समझने के समान है। सच आचरण से बड़ा प्रमाण नहीं होता और चरित्र से बड़ा कोई चित्र नहीं होता। राजनीति से 1936 मे ही सन्यास ले सम्पूर्ण जीवन समाज के नाम करने वाले महामना ने महात्मा गाँधी को टुकड़ो में मिली आजादी न स्वीकार करने की नसीहत दी थी, आखिर 12 नवंबर 1946 का वो दिन आ ही गया जो हमसे मालवीय जी का शरीर जुदा कर गया। आजादी का सूरज देखने से पहले ही भारत माँ का दिवाकर अस्त हो गया शायद इसलिये की जो सूरज 15 अगस्त 1947 को निकला उसकी लाली में मालवीय की चमक सदा सदा के लिये समा सके। महामना आज भी भारत की आत्मा, आवश्यकता और प्रणेता है नमन माँ भारती के लाल को। 

संदीप मिश्र

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