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भारत

जुमलाजीवी से बेहतर है आंदोलनजीवी


    
आंदोलन समाज की प्राण शक्ति है, राष्ट्रभक्ति के गीत, गरीब की पुकार,सत्य की हुंकार,सर्वस्व निछावर करने की ललकार, आंदोलन से ही प्राप्त रत्न है। जिसे देश के सच्चे सपूत तिलक,गोखले, महात्मा,सुभाष,भगत, आजाद,अंबेडकर समेत न जाने कितने नायकों ने आंदोलन के मान को बढ़ाया है।
          संसद के इस गोल घेरे की कुछ में कुछ गड़बड़ी जरूर है जो भी अंग्रेजों की बनाई इस इमारत में शक्तिशाली होता है वह खुद ब खुद  तानाशाह का स्वरूप बन जाता है। जनता का दर्द, जनता के मुद्दे, जनता की आवाज को दबाने का मंत्र यंत्र तंत्र सब इसी गोले से गोल घेरे से ऐसे दागे जाने लगते हैं जैसे जनता से दोबारा उन्हें मिलना ही नहीं। 
     आंदोलन के मंथन से आजादी निकली गांधी दुनिया में आंदोलन के मसीहा जाने जाते हैं, जिनके आंदोलनों का अनुसरण करने वाले दुनिया भर मे राष्ट्र नायक कहलाये नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग,दलाई लामा इस फेहरिस्त में सबसे आगे खड़े हैं।जिन्होंने गांधी आंदोलन की सीख सत्य अहिंसा को अपना दुनिया की सोच बदलने की कोशिश की है।     इस नाते गांधी विश्व के सबसे शक्तिशाली आंदोलनकारी है, जिन्होंने 1917 में चंपारण सत्याग्रह,1920 असहयोग आंदोलन,1930 सत्याग्रह, 1933 दलित आंदोलन, 1942 भारत छोड़ो आंदोलन आखिर  आंदोलन की ही जीत हुई आजादी का सूरज आंदोलन जीवी सभी बडे नेता राष्ट्र निर्माता कहलाये।
      
      आंदोलन की आवाज में इतनी ताकत होती है कि बहरी सरकार में सुनने की शक्ति आ जाती है, और गूंगी सरकार बोल उठती है। गवाह है 1955 का अमेरिका में हुआ रोजा पार्क्स आंदोलन जिसमें अश्वेत महिला को बस की सीट से उठा देने के बाद जन्मा,1968 फ्रांस का छात्र आंदोलन इस आंदोलन में 22% नागरिक  शामिल थे जो करीब ग्यारह लाख की संख्या थी, इस आंदोलन की ताकत देख तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स डे गाल को देश छोड़ जर्मनी की शरण लेनी पड़ी थी। 1973 का चिपको आंदोलन वृक्ष,धरा,हवा,जंगल को बचाने के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन चमोली से उठा और देखते ही देखते पूरे उत्तराखंड में फैल गया। वनों की कटाई रोकने के लिए ग्रामीणों पेड़ो से चिपक  चिपको आंदोलन को अमर कर गये। 1989 थ्येनआनमन स्क्वेयर प्रोटेस्ट चीन के इस आंदोलन को जून फोर्थ इंसिडेंट के नाम से भी जाना जाता है। 1990 मंडल कमीशन के खिलाफ स्वत स्फूर्त आंदोलन की यादें भला कौन भूल सकता है?
यह सत्य है कि आजादी के लिए जनसंघियो ने कोई आंदोलन नहीं किया बल्कि आंदोलन के सबसे बड़े नायक महात्मा की हत्या करने वाले इसी विचारधारा के अगुआ बताए जाते हैं। इस हवाले से वर्तमान सरकार की जड़े आंदोलन और आंदोलन के नायकों को मिटाने वालों के रूप में प्रासंगिक रहे हैं। राष्ट्र की आजादी के लिए भले ही इन्होंने कोई आंदोलन नहीं किया हो पर सत्ता के लिए इनके नेताओं ने कई आंदोलन कर कुर्सी जीवी  होने का तगमा हासिल किया है। रथयात्रा, भारत एकता यात्रा, लाल चौक का आंदोलन कांग्रेस के खिलाफ महज ₹40 लीटर पर बिक रहे पेट्रोल की कीमत पर महंगाई के खिलाफ जनांदोलन, कालाधन वापसी आंदोलन आखिर सारे आंदोलन कुर्सी की भूख मिटाने तक ही सिमट कर निपट गये।
       
   आज प्रचंड बहुमत प्रचंड अभिमान से सराबोर मन की सरकार का शासन है। जहां जन को दिए गए वादे जुमला साबित हुए ऐसे जुमला जीवी से आंदोलन जीवी हजार गुना बेहतर है। रोजगार का वायदा पकौड़ा वन आत्मनिर्भर हो गया, महंगाई की हुंकार लाचार हो डायन से डार्लिंग हो गई, एक सिर के बदले दस सर सिरे से खारिज कर दिया गया है, काला धन इतना काला हो गया है कि सूरज का उजाला भी उसे तलाश नहीं पा रहा है। कीलो से किसानों के पांव को रोकने वाली सरकार अब उन्हें अपमानित कर दंभी हो गई है। भाषा ऐसी जैसी कभी किसी ने ना बोली ना सुनी होगी।वह भी उस मुंह से जो संत भेष धारण कर जटा जूट में तपते दिखते हैं। मोर को दाना चुगाने में मशगूल हैं मोर जीवी ये आंदोलनजीवी, किसी चायजीवी,आंसूजीवी भाषणजीवी, जुमलाजीवी से लाखों गुना बेहतर है क्योंकि ये झूठ की फसल नहीं उगाते ये किसान है।
सन्दीप मिश्र

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