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पंजाब-हरियाणा

आषाढ़ का एक दिन'-मेरे दिल के बहुत करीब है

'आषाढ़ का एक दिन'-मेरे दिल के बहुत करीब है...स्वयं को कहीं न कहीं मल्लिका के निकट पाती हूँ,कभी-कभी ऐसा सोचती हूँ कि कोई भी स्त्री जो प्रेम में है वो मल्लिका है और प्रत्येक पुरुष कालिदास से साम्य रखता है।मल्लिका का चरित्र एक अल्हड़ नवयुवती की भावुक संवेदनाओं को प्रकट करता है,-"माँ,मैंने भावना में भावना का वरण किया है'...माँ उसे समझाती है,आगाह करती है जीवन की स्थूल आवश्यकताओं के प्रति...पर अल्हड़ता भविष्य कहां देखती है...
कालिदास पौरुष दम्भ का प्रतीक है,उसके शब्दों में,"राजकीय मुद्राओं से क्रीत होने के लिए बाध्य नही"
         नाटक के संवादों के साथ साथ मोहन राकेश ने शब्द बिम्बों का ऐसा प्रयोग किया कि पाठक अस्पृश्य सौंदर्य का मांसल साक्षात्कार कर लेते हैं।कालिदास और मल्लिका प्रेम में डूबे हैं पर राजसी सत्ता और सम्मान का लालच कालिदास को ग्राम-प्रान्तर की कोमल भूमि से राजनीति के अंधकार में पहुंचा देता है।पर आज भी दोनों प्रेम की झीनी कमज़ोर पड़ती तार से जुड़े हैं,वो तार पर्वत-शिखरों को सहलाती मेघ मालाओं से निर्मित है।कालिदास उस भूमि से कई सूत्रों से जुड़ा है जिनमे ग्राम-प्रान्तर,आकाश,मेघ,हरियाली,हरिणों के बच्चे और एक मल्लिका है...पुरुष की यही वृत्ति है स्त्री उसके कई सूत्रों में से मात्र एक सूत्र बन कर रह जाती है पर मल्लिका के लिए कालिदास सर्वस्व है,वो अपने भविष्य का तिरस्कार कर कालिदास की प्रेरणा बनते हुए कहती है कि तुम्हारे नव निर्मित छंदों में मैं स्वयं का निर्माण होते देखूंगी।विडंबना यह कि स्त्री का हृदय कभी भी पुरुष की चतुराई नही जान पाया। मोहन राकेश विलोम नामक  चरित्र के माध्यम से मल्लिका को चेतना देने का प्रयास भी करते हैं,विलोम मल्लिका को समझाता है कि समय तुम्हारे मन,शरीर और आत्मा की इकाई को तोड़कर रख देगा ,पर मल्लिका प्रेम की भावुकता में कालिदास की चतुराई नहीं जान पाती।
     आकाश में बनते -मिटते चित्रों का मोह कालिदास को फिर उन्हीं पर्वत-श्रृंखलाओं में खींच लाता है। यों भी असफलता के नाज़ुक क्षणों में विस्मृत प्रेम की स्मृति हो ही जाती है।कालिदास मल्लिका से उसी प्रेम की आकांक्षा रखता है।पर समय निष्ठुर है,मल्लिका के वक्ष से चिपटी पुत्री कालिदास को असहनीय है उसका पुरुषत्व उसे हेय दृष्टि से देखता है। मल्लिका के शब्दों में,-"यह मेरे अभाव की संतान है,जो भाव तुम थे,वह दूसरा नहीं हो सका,पर अभाव के कोष्ठ में किसी दूसरे की जाने कितनी -कितनी आकृतियां हैं।"... सम्पूर्ण नाटक में यह संवाद सर्वाधिक हृदय विदारक है,मेरी भावनाओं का नायक ऐसी नायिका को तत्काल स्वीकारता और ले जाता पर्वत उपत्यकाओं की उन्हीं मेघ मालाओं में जहां दोनों ने कितनी प्रेम क्रीड़ाएं की थीं...पर मोहन राकेश की नाट्य लेखन की कला अदभुत है,कथा को तीव्र और हृदय विदारक मोड़ देने की कला उनमे है।
     अपने मन के अंधेरों  के अनुरूप ही अंधकार में उस कायर कालिदास का प्रवेश हुआ था, कालिदास मल्लिका के संबोधन का कोई प्रत्युत्तर दिए बिना पूर्व की भांति अंधकार में विलीन हो जाता है।
पुरुष का प्रेम ऐसा ही है,उसे एकनिष्ठ प्रेम की लालसा है,वो चाहता है कि वर्षों नर्तकियों के नृत्य-गायन में डूबने के पश्चात ,राजसी वैभव का आनंद लेने के पश्चात जब वापिस जाए तो मल्लिका सदैव की भांति उसकी प्रतीक्षा में लीन हो।मल्लिका के अभाव ,उसकी पीड़ा कालिदास के पौरुष को संतुष्टि देते प्रतीत होते हैं,पर उसकी अनाम पुत्री का रोदन उसके अहंकार के टूटने का रोदन है....

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