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ऊपर से कोई खास निर्देश मिले हैं क्या? SC में अर्णब केस की तत्काल सुनवाई पर भड़के वरिष्ठ वकील

छुट्टी  के दिन अर्णब गोस्वामी के केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई करना जबरदस्त चर्चाओं के घेरे में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने इस पर आपत्ति उठाते  हुए  सुप्रीम कोर्ट महासचिव को कडे शब्दों में पत्र लिखा है। पत्र में लिखा है की यह दुखद है कि गोस्वामी जब भी सुप्रीम कोर्ट से दरख्वास्त करते हैं तो हर बार उनकी याचिका तुरंत क्यों और कैसे लिस्ट हो जाती है।क्या इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश और रोस्टर के मास्टर ने कुछ विशेष आदेश या निर्देश दे रखे हैं?

 

Arnab Goswami, Republic TV: सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्णब गोस्वामी के मामले में बिल्कुल कड़े शब्दों में एक पत्र लिखा है। यह पत्र सुप्रीम कोर्ट के महासचिव को लिखा गया है और कहा गया है कि वह इस चिट्ठी को उस बेंच के सामने पेश करें जो गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई करेगी। दवे ने इस चिट्ठी के जरिए अर्णब की जमानत याचिका को सुनवाई के लिए अगले ही दिन लिस्ट करने पर सवाल उठाया है।

 

दुष्यंत दवे ने अपनी चिट्ठी में लिखा-  मैं यह पत्र सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन के अध्यक्ष की हैसियत से जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की बेंच में सुनवाई के लिए लिस्ट की गई याचिका के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध जाहिर करने के लिए लिख रहा हूं। मेरा गोस्वामी से कुछ व्यक्तिगत लेना-देना नहीं है और मैंने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाने के उसके अधिकार में किसी तरह का हस्तक्षेप करने के मकसद से यह चिट्ठी नहीं लिखी है। हर नागरिक की तरह उन्हें भी सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की मांग करने का अधिकार है।

 

गंभीर मुद्दा यह है कि आपके नेतृत्व में रजिस्ट्री कोविड महामारी के दौरान पिछले आठ महीनों से केस की लिस्टिंग में निष्पक्षता नहीं बरत रही है। एक तरफ हजारों नागरिक जेलों में बंद हैं और सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी याचिकाएं सुनवाई के लिए हफ्तों और महीनों तक लिस्ट नहीं होती हैं। ऐसे में यह बहुत दुखद है कि गोस्वामी जब भी सुप्रीम कोर्ट से दरख्वास्त करते हैं तो हर बार उनकी याचिका तुरंत क्यों और कैसे लिस्ट हो जाती है।क्या इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश और रोस्टर के मास्टर ने कुछ विशेष आदेश या निर्देश दे रखे हैं?यह अच्छी तरह मालूम है कि अप्रत्याशित तौर पर किसी केस की सुनवाई के लिए तत्काल लिस्टिंग चीफ जस्टिस के विशेष आदेश के बिना नहीं हो सकती है और न होती है।

 

क्या प्रशासकीय प्रमुख के रूप में आप या रजिस्ट्रार गोस्वामी को विशेष महत्व तो नहीं दे रहे हैं? जब लिस्टिंग के लिए कंप्यूटराइज्ड सिस्टम है जिसमें सिस्टम की खामियों की वजह से गोस्वामी जैसे लोगों को विशेष सुविधा मिलती है काम ऑटोमैटिक लेवल पर होता है तो फिर इस तरह की सेलेक्टिव लिस्टिंग क्यों हो रही है? ऐसा क्यों हो रहा है कि केस इधर से उधर घूम रहे हैं और वो भी कुछ खास बेंचों में?

 

हर नागरिक औऱ हर ऐडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के लिए उचित और निष्पक्ष सिस्टम क्यों नहीं है? जबकि सामान्य भारतीयों को जेल जाने समेत तमाम तरह की कठिनाइयां झेलनी पड़ती है। कई बार तो उन्हें अवैध और अनाधिकृत तौर पर जेल भेज दिया जाता है। यहां तक कि पी. चिदंबरम जैसे प्रतिष्ठित वरिष्ठ वकील की याचिका की भी तत्काल लिस्टिंग नहीं हो सकी थी और उन्हें महीनों जेल में गुजारना पड़ा था जब तक कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत के लायक घोषित नहीं किया।

 

दुष्यंत दवे ने अपनी इस चिट्ठी में साफ लिखा है कि अर्णब गोस्वामी की याचिका की तत्काल लिस्टिंग आधिकारिक शक्तियों का पूरा-पूरा दुरुपयोग है। इससे ऐसा संदेश जाता है कि कुछ विशेष वकीलों के मुदालयों को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है। मेरा आग्रह है कि जब तक लिस्टिंग के लिए फुलप्रूफ सिस्टम लागू नहीं हो जाए तब तक गोस्वीम की याचिका की भी लिस्टिंग नहीं होनी चाहिए।

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