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फिर हुआ दंगा... फिर जली दिल्ली...

    आग की लपटें घर तलाश रही थी, तमंचो की तलाश लाश थी, पत्थर सिर तलाश रहे थे, एक धर्म वालों की तलाश दूसरे धर्म के लोग कर रहे थे, लुटेरों को सामान की तलाश थी, आवारा जिस्म तलाश रहे थे, नेताजी जहरीले बोल, पत्रकार खबर, पुलिस छुपने का ठिकाना, इंसानियत लुट जाने का कारण, मानवता मर जाने की वजह और दिल्ली अपने दामन पर लगे दाग तलाश रही थी। 

     आग के अंगारे, पत्थरों के ढेर, नारों का शोर, आफत की कराह वेदना, मौत के मातम, कत्ल की चित्कार, गोलियों की धांय-धांय, लुटेरों की टोली, भड़काऊ भाषण, पुलिस पर हमला, सिर कुचलने को आमदा भीड़, सहमी, डरी, सुलगती, सुबकती दिल्ली ये सब देखने को मजबूर थी और हम सबने मजबूर दिल्ली को इन्ही आंखों से लाचार तकते रहे, बेबस देखते रहे। 
   
    सबसे बड़े लोकतंत्र का मंदिर जिस दिल्ली के दिल में है, दुनिया की शक्ति का केंद्र जिस दिल्ली ने अपने बाहों में समेट रखा है, जिस दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, मुख्यमंत्री का निवास हो। जी हाँ वही दिल्ली सरेआम बेबस बेसुध बेहवास लोगो के हाथों लूटी जा रही थी। लुटेरों, अपराधियों, साजिशकर्ताओं की टोली नफरत की दहशत से दिल्ली के कलेजे को जला रहे थे। उसी दिल्ली को जिसके शान मे ये कसीदे गढ़े जाते हैं कि उसकी मर्जी बगैर परिंदा भी पर नहीं मार सकता, यह तस्वीर इसलिए भी विचलित करती है क्योंकि दुनिया के दो सबसे बड़े लोकशाही के अगुआ जिस दिन दिल्ली में हाथ मिला रहे थे उसी दिन उपद्रवी दिल्ली को दहला रहे थे, दिल्ली को भीगी बिल्ली बनाने का जिम्मेदार कौन? दिल्ली को जख्म देने का जिम्मेदार कौन?

      भीड़ का खौफ जमीं से आसमां तक धुआँ धुआँ हो कहर बरपा रहा था। रिक्शे, दूध की दुकान, गली-मोहल्ले को आगोश में लेते खाकी तक बेखौफ आ पहुँची, देखो कितने मां के लाल इस बेरहम दंगों मे दिल्ली का हाथ छुड़ा दुनिया छोड़ गए। जिनके अपने घरों में आ गए उन घरों के कपाट तपाक से बंद हो गए और जिनके अपने कहीं राह में फंसे रह गए उनकी सांसें अटकी रही, बुरे-बुरे अंदेशो के डर से रूह काँप रही थी। कही दूर भागते वाहन, सायरन की आवाज, अनहोनी का आग़ाज़ मौत के पैगाम से कम न थी, कहीं दूर से आता भीड़ का उन्मादी शोर आशंकाओं, अफवाहों के चादर में लिपटा सिमटा आंसुओं के सैलाब जैसा था। 

        महात्मा गांधी की समाधी जिस दिल्ली की जमीं में है, वही दिल्ली हिंसा की जद में घिरी रही, जिन हत्यारों ने अहिंसा के पुजारी की साँसे छींन ली थी कुछ वैसे ही लोग एक बार फिर सड़क पर भीड को ललकार, पुलिस को धमका, बदला लेने की बात कह तालियाँ बटोर रहे थे... और तालियों के दौर के बाद गालियों, आग के बवंडर, पत्थरों की बरसात, मौत का नंगा नाच, लुटेरों की बारात, दहशत की सौगात लेकर आई। एक ही कमरे में सिमटा परिवार और परिवार का चौकन्ना मुखिया आंखों में रात काटने को मजबूर था। घर-घर की यही कहानी थी, गरीब बेगुनाह खौफ के साए में सुबक दुबक रहा था और यह दंगे की रात हाँ यह काली रात खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। रात के सन्नाटे आग के घेरों में घिरे घरों में घनघनाते मोबाइल को तपाक से चुप करने की छटपटाहट पूरे परिवार को पसीना पसीना कर रही थी। बिना दुआ सलाम पहला सवाल सब ठीक है ना? किसी को चोट तो नहीं लगी? जल्दी से दिल्ली छोड़ दो घर लौट आओ... यह गिनती के सवाल हैं जो बार-बार हर मोबाइल फोन पर गिनाए जा रहे थे। फिक्र भी जाहिर थी लाजमी थी, जनाजो का अंबार था मातम का सैलाब था। 

   अमन, शांति फिर लौटेगी। घरों से बाहर हम सब फिर निकलेंगे, हमारे मासूम बच्चे थोड़े बड़े जब होंगे और तब इस दंगे की रात का दोषी पूछेंगे? तो बताओ क्या जवाब दोगे? इस गुनाह का गुनाहगार किसे बताओगे? उंगलियां कई ओर उठेंगी, निराश हर उस तंत्र ने किया जिसमें दंगा रोकने का दम था। ये दंगे का दाग जो दिल्ली के दामन को दागदार कर रहा है यह सियासत के चेहरे पर कालिख भी पोत रहा है। वक्त रहते यह दंगा रोका जा सकता था, दंगाइयों को खदेड़ा जा सकता था, बेगुनाहों की जान बचाई जा सकती थी, आग की लपटें बुझाई जा सकती थी, फिर कौन था? जिसकी खामोशी ने दिल्ली को मौत की मंडी, लुटेरों का सामान, आंसुओं का समंदर और आग का गोला बना दिया? उन जालिम चेहरों से भी नकाब हट जाएगा आज नहीं तो कल... इस सबके बीच उम्मीद बनकर उच्च न्यायालय के न्यायधीश आए... पुलिस को फटकार लगाई, चेहरों को इंगित किया, मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया, उनके आदेश के बाद एक आदेश और आ गया उनका तबादला हो गया आखिर क्यों यह सवाल भी पूछा ही जाएगा? 
 

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