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पंजाब-हरियाणा

सबसे बड़ा रोग और चुनाव आयोग 

 

        चिंता मुक्त चिताओं की कतार, इलाज की दरकार, अस्पताल लाचार, परेशान सरकार ,पीड़ा में डूबा संसार, परिवारों में हाहाकार ,जीते जी फटकार ,मौत के बाद दुत्कार, लाशों का अंबार, करोना की बढती रफ्तार, टूटती इंसानियत रिश्ते तार-तार, मौत के कोलाहल में चुनावी बिगुल मातम की वह धुन है जिसे चुनाव आयोग के अलावा सब सुन रहे है सहम रहे है।

चुनावी प्रचार का वार करोना की फैक्ट्री बन नित नए रूप बदल फेफेडो को खा रहा है। 1189 रंग रूप में छुपा ये कोरोना का काल अब ठहरे हए प्रचार में वो गहरा घाव दे गया है,जिस लर मरहम लगाने में भी हाथ कांपने आँखे टपकने लगी है। आंकड़े बोल नहीं डरा रहे हैं, यह ख्वाब जो चुनावी राज्यों में बरपा है इसकी छूट किसने दी? समय पूछेगा जरूर वक्त की कचहरी में जब मुजरिम खड़ा होगा तो सवालों की बौछार में जवाब का छाता छोटा पड़ जाएगा, अपराध इतना बड़ा है कि शहर दर शहर मौत के मुहाने पर आ खड़े हैं । चुनावी घंटी बजी नेताओं की दौड़ शुरू हुई रोड शो, रैली ,भाषण, पदयात्रा, पर्चा, पोस्टर, शामियाना ,टेंट के बीच कोरोना का कद इतना बड़ा हो गया की वो दानव से दावानल बन गया।

पांच चुनावी राज्यों में नेताओं के जुमलेदार भाषण, भीड़ दार तमाशा, उड़न खटोला का सैलाब, रोड शो का अहंकार आखे तरेर रहा था,नेताओ के लिए तो खेला हो रहा था चुनाव आयोग खेल करवा रहा था और इस सियासत उठापटक के खेल में जनता को निगलने वाला कोरोना अपना आकार प्रकार प्रसार विकराल कर रहा था। चुनाव से पहले सिमटा कोरोना ने नेताओए की नौटन्की को माध्यम बना अपनी रफ्तार को 600 गुना से भी अधिक बढ़ा लिया। यह बीमारी जो चुनावी समर में बढ़ा दी है उसका निवाला वही गरीब, मजदूर,कामगार, मतदाता बन रहा है जिसे सुनाने, दिखाने, बताने के लिए दूर-दूर से बुलाया, भगाया, दौड़ाया, लौटाया गया। यह आंकड़े रोंगटे खड़े करते हैं, सवाल पूछते हैं, जिंदगी जरूरी यह कुर्सी का खेल? इस चुनावी रण के बहाने मृत्यु क्षेत्र अनजाने में नहीं बना दिया गया या साजिशन? कोरोना संक्रमण काल में एक साल का राष्ट्रपति शासन लगा अनुकूल स्थिति का इंतजार नहीं किया जा सकता था? क्या संक्रमण फैलाव में आठ चरण तक चुनाव फैलाना मौत को दावत देना नहीं है क्या? अभी भी चुनाव आयोग का चुनाव नहीं समेटना जिंदगी छीनने जैसा नहीं है? सवाल पूछने वालों के होंठ पर ऐसे सवाल क्यों नहीं आते? यह सवाल भी समय जरुर पूछेगा।

       अब दुनिया को पछाड़ भारत कोरोना का बाप बन खड़ा है। 2 लाख 17 हज़ार 353 नए मामले पुराने कीर्तिमान की छाती पर खड़े अट्टहासा लगा रहे हैं, मानो नेताओं को मुंह चिढ़ा रहे हैं, चुनाव आयोग को ठेंगा दिखा रहे हैं। श्मशान के बाहर हाउस फूल, अस्पतालों के खड़े हाथ, ऑक्सीजन की किल्लत, बिस्तरों की मारामारी, दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति वाले देश के इस ह्रदयविदारक मातम को देख क्या सोच रही होगी दुनिया? जिस देश में चुनाव की तैयारियां के लिए दल दो -दो साल पहले जुगत, जुगाड़, तोड़फोड़, धन,बल ,छल, प्रपंच की बिसात बिछाने लगते हैं। वहा करोना कि एक भयानक मार के बाद भी शिफर तैयारी और चुनावी बेताबी श्मशान और कब्रिस्तान की शान बढ़ाने का प्रमुख कारण नहीं है क्या? देखिए इन तबाही की तस्वीरों को फिर बनाईये अपनी राय और खामोशी के कफन से निकल कर जिंदा हो तोकि आवाज भी उठाना वरना चिता भी समय पर नहीं चल रही है आज तो कल लाशों का क्या होगा सोच भी नहीं सकते।

असम में 16 से 31 मार्च तक महज 537 कोरोना संकर्मित मरीज थे, जो 1 से 15 अप्रैल तक 3897 तक पहुंच गए यह वृद्धि दर 625% की रफ्तार पकड़ तबाह कर रही है। पश्चिम बंगाल में 504% वृद्धि की दर दर दर्ज हुई और 16 से 31 मार्च तक जहां पश्चिम बंगाल में महज 32 व्यक्तियों की मौत हुई थी वही 1 से 15 अप्रैल तक 149 लोग कोरोना के कारन काल के गाल में समा गए, तमिलनाडु में उपयुक्त तारीख के आंकड़ों में 190% दर की वृद्धि दर्ज की गई तो पांडिचेरी में 195% और केरल में 125% से भी अधिक की संक्रमण रफ्तार दर्ज की गई है चुनाव ने देश को नई सरकार से पहले क्या उपहार दिया है। दोशी कौन? निर्णय किसने लिए? ये चुनावी चाल जाल किसने बुना? क्या जनता की जान से कीमती सत्ता संग्राम था? क्यों चुनावी फैलाव को समेटा नहीं गया? चुनावी रैली रोड शो की लापरवाही को आखिर शह कौन दे रहा था? किसे रोकना था ? और वह क्यों रुका रहा?

जब सबसे बड़ा रोग खेल रहा है पर्सन रहा था तो चुनाव आयोग अब सबसे जब सबसे बड़ा रोग बाहें पसार रहा था तो चुनाव आयोग बाहे समेटे क्यो सहमा सब होने दे रहा था? यह चुनावी चाल चिताओं का बोझ उठा पाएंगे क्या? क्या-क्या पूछे ?जब जवाब देने वाले दवाब देने पर आमादा हो।यह चुनावी खुला खेल मौत की बारिश ले आया है जिसमें पांच चुनावी राज्य डूबे घिरे देश को घेरे नजर आ रहे हैं। इस चुनाव में से एक सबक और है जनता के लिए, जनता की बुनियादी सुविधाओं को रौंद नेताओ ने जो सपनों का बाजार बनाया है उन नेताओं के लिए जान की बाजी लगा आखिर जनता को क्या मिलेगा? यह पूछना लाजमी है कि सबसे बड़ा रोग और चुनाव आयोग का सहयोग देश हित मानव कल्याण इंसानियत के लिए क्या रहा?  

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