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भारत

हे राम, हाय राम, राम- राम, जय श्री राम

गूंज रहा है गली-गली


       राम लगाए पार, राम ही  आधार, राम बचा लो, हे राम सुन लो, राम नाम सत्य है..... रामनी टूटती सांस,छूटती  आस, बरसती आख, बेबस इंसान की आह बन घर-घर, गली-गली अस्पताल से लेकर शमसान तक गुंजायमान है... राम ही अंतिम शरण ,राम ही अंतिम कवच, राम ही रक्षक, राम चाहे तो बचा ले। राम नाम की ये करुण पुकार राम नाम के साथ छुटती-टूटती उम्मीद के बीच जय श्री राम की दहाड़ लगा कुर्सी समेटने के दंगल में मगन मंत्री, संत्री, शाह, साहेब को चिताओ की चित्कार भी न रोक पाई, मौत की हाहाकार भी ठहरा न सकी। राम नाम से राजनीति की वैतरणी पार कर बंगाल का सिंहासन कब्जाने की बेचैनी देश की बेचैन, बेबस, बेसहारा सांसों  को बचाने से ज्यादा जरूरी ज्यादा आवश्यक है शायद... तभी तो मन की बात बताने की जिद्द मानवता बचाने से ज्यादा जरूरी लगी देश के नेता को। आज भी मोदी जी की रैली है क्या बोलेंगे ? कैसे बोलेंगे ? कितना साहस जुटा बोल पाएंगे? चिताओं के मेला, आंसुओं के सैलाब, वेदना के पहाड़ को पार कर प्रधान सेवक की दीदी को दहाड़ मारने के लिए वाकई 56 इंच का सीना चाहिए, शांत चित, कठोर छाती, जीवन मौत से परे का मन और झोला उठाकर चल पड़ने वाला बैरागी चाहिए ।यह गुण तो आप में कूट-कूट कर भरे हैं, पर वतन को इस महामारी मे उस प्रधानमंत्री की जरूरत है,जो दल से बड़ा देश को मानता हो, जो मत से ज्यादा बहुमूल्य मतदाता को मानता हो,जो जीत से बड़ा जीम्मेंदारी है जानता हो , हमे वो नायक चाहिए जो मौत के इस तांडव में मरहम बन ज़िमेदारी के साथ हमारे दुख दूर करने में पसीना बहा रहा होता बल्कि इसके की सत्ता पाने के लिए आंसू घड़ियाली छलका रहा होता। देश की लाखों रोती आंखे उस चौकीदार को ढूंढ रही है जो उड़नखटोले में हिचकोले ले बंगाल नाप रहा है। आज भी प्रधानमंत्री की वोट बटोर रैली है, राहत बस इतनी सी है कि आज साहेब दिल्ली से मन की बात सुनाएंगे,सुनहरे सपने दिखा सोनार बंगला का ख्वाब बेचेंगे,उड़ कर बंगाल नही जायेगे। समय का पहला हक रैली, वोट ,जीत, दल के लिए है फिर जो बचेगा देश को भी बचाएंगे।

       राष्ट्र भीषणतम संकट के गिरफ्त में है, और सत्ताधीश ममता को घेरे खड़े हैं। दीदी वो दीदी... कहकर ललकार रहे हैं। सेवा करेंगे, रोजगार देंगे ,राहत देंगे, सोनार बांग्ला बनाएंगे बोल रहे है। बंगाल के लोग भी देश की तस्वीर देख ही रहे हैं मरने वालों की करुण पुकार, शमशान कब्रिस्तान के बाहर की कतार, ऑक्सीजन की कमी  से लाचार, अदालत की फटकार और आपकी ममता मुक्त बंगाल की रार । साहेब हे साहेब आपको तो धरा के एक महानायक ने पहले भी सिखाया, बताया ,समझाया था राजधर्म का पालन करें । तब गोधरा जला था, कत्लोगारत मचा था,गुजरात धधक रहा था, लहू के छींटे गुजरात के नक्शे का रंग लाल कर रही थी, जनता हर आहट को मौत मान सहमी थी, बेगुनाह हुड़दंगियों के हाथ मारे ,काटे, जलाए,फूके, जा रहे थे । खाकी शांत जनता पर खौफ बरप रहा था। महान अटल ने राष्ट्र को साक्षी मान सबके सामने संदेश दिया था राजधर्म का पालन करो। अब अटल रहे नहीं ...आडवाणी की सुनते नहीं...  अपने कद का अपने के पद का कोई शेष नहीं छोड़ा समूचे दल में जो आपको स्मरण करा सकें कि राजधर्म सबसे बड़ा धर्म है।  जनता ने आपको मसीहा  मांन सर्वोत्तम दिया है उसके बदले आप उसे क्या लौटा रहे हैं? समय बार बार पूछेगा, वक्त बार बार लिखेगा, और जब इतिहास बार बार दोहराएगा तो पीढ़ियों की रूह कांप उठेगी, आंखें नम हो जाएंगी, चिताओं की लपटों के बीच सत्ता की सत्ता की छटपटाहट, नारों की बौछार, वादों की झड़ी, जीतने की जुगत, हराने का संकल्प मौत से जुझते देश को पीछे छोड़  कहा से आई आपके विशालकाय विराट सीने में ? आज का यह प्रश्न कल उत्तरहीन हो ठहाके लगाएगा।

    स्मरण रहे ध्यान रहे कोई भी चुनाव आखिर आखरी नहीं होता... हर चुनाव के बाद चुनाव होता ही रहा है होता ही रहेगा ,इस चुनाव के बाद जब आपको फिर चुनने की बारी आएगी तो घरों में माला चढ़ी माँ -बाप, भाई- बहन, पति -पत्नी, बेटा- बेटी, दादा -दादी की तस्वीरें देख लोग जब वोट देने निकलेंगे तो सोचेंगे जरूर.... किस की नियत में खोट था? कौन बचा सकता था? कौन सुविधा दे सकता था? किसके राज में सांसे चलाने से ज्यादा उद्योग चलाने के लिए ऑक्सीजन की भरपाई थी ? अदालत ने किस सरकार को दुत्कातरते फटकारते कहा था "हम स्तब्ध हैं, अस्पतालों में ऑक्सीजन की किल्लत है, पर स्टील व पेट्रोलियम उद्योग को ऑक्सीजन मिल रही है, मानवता की कोई भावना बची है या नहीं? आप गिडगिडाइए, उधर लीजिए, या चुराईये लेकिन ऑक्सीजन लेकर आइए। हम मरीजो को मरता नही देख सकते।

    जाओ जीत लो सभी चुनाव, कब्जा लो सारी कुर्सियां, सबसे ऊंचा कद पा लो, पर क्या दिल भी जीत पाओगे.....? चिताओ से मुंह मोड़ जो समर जीतने निकले हो वह पांच साल से ज्यादा का सुख नहीं है। देश सेवा का जो अवसर खोया है वह मानव से महामानव बना देता आपको, अमरत्व देता, इतिहास के सुनहरे पन्नों में स्वर्णिम आभा देता, वो  चमकता दमकता नाम आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता, युगपुरुष महानायक की संज्ञा देता, आपको इस गौरव से बड़ा बंगाल लगा .....जीत मिले या नहीं मिले परिणाम तो अभी शेष है पर इस सेवा के अवसर पर जो झोला उठा,सरकार उठा,मंत्री मुख्यमंत्री उठा बंगला को एक महिला नेत्री को घेरे खड़े हो वतन के आंसुओं की स्याही उस दर्द को इतने गहराई से लिखेगी की वक़्त से मिटाए न मिटेगी। कर लो रैली,लड़ लो चुनाव,बढ़ा लो दल, मिटा दो दुश्मन,कुचल दो तृण मूल,पर मानवता से दुश्मनी क्यो? कभी समझ आये तो समझा देना।
संदीप मिश्र

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