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भारत

आस तलाश निराश लाश हताश

जिंदगी बस इतनी

     साँसें टूट गई पर कतार न छूटी रुह रुखसत, जिस्म कब्रगाह में कब्र की तलाश में... लाशों पर लाश दफन नहीं हो सकती तो जनाजा ले निकल पड़े आखिरी ठिकाने को पाने जहाँ मिट्टी मिट्टी में मिल जाए वह मिट्टी बन मिट जाये। वो मिट्टी बिना कतार नसीब हो जाए ये नसीब की बात ना रही। मौत के इस मातम में श्मशान में कांधे से उतर अर्थियां कतार में सिमट सरक रही हैं, इस आस में कि चिता मिले, अग्नि मिले, मुक्ति मिले... मौत के बाद भी कतार इंतजार लाश लाचार समय तक क्रूर अत्याचार है जो मानवता विवशता से देख चीत्कार रही है पर उसकी सुनेगा कौन? सताए तो हम सभी है पर ज़िन्दगी के बाद का सफर इतना कठिन इतना बेपीर इतना लम्बा कभी न, जो चैन से जी नहीं सके वो चैन से जल भी नहीं सके ये हकीकत बेचैन करती है, दिल दुखाती है शहर ए खामोश में कब्र मांगने वालों का शोर।
    घर में कैद इंसान की साँसों पर जैसे धावा बोलता है कोरोना बस जिंदगी इन्हीं चार शब्दों के इर्द-गिर्द मंडराने लगती है... आस, तलाश, लाश और हताश सबसे पहले दिल को दिल का पैगाम कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जाएगा का संदेश, घबराओ नहीं की बातें फिर तलाश एक अस्पताल की, एक डॉक्टर, उपचार की, पर ऑक्सीजन की किल्लत में कपाट भेड़े खड़े अस्पतालों के दरबान दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही लौटा रहे हैं निराशा ने आँखों में घर किया बीमार ने अगले अस्पताल की ओर रुख किया। भागदौड़, ऑक्सीजन की उपलब्धता आ टिकी उखड़ती साँसों के उम्मीद की डोर। निराशा और निराश होने लगती है उत्साह खौफ बेबसी लाचारी नाउम्मीदी के सवालों में घिरने लगता है। बढ़ गए फिर तलाश में कहीं और... कहीं और... कहीं और... इस तलाश ए सफर में कितनों को मंजिल से पहले ही मौत गले लगा लेती है, कितनों की साँसें ठिकाना मिलने से पहले ही उखड़ जाती हैं, कितने ही मरीज बेदम हो अस्पताल की बजाय शमशान की ओर मुड़ जाते हैं। ये आंकड़े डराते हैं मोहब्बत की नगरी आगरा में अपने पति को मुँह से प्राण फूंकने की नाकाम कोशिश करती एक महिला की तस्वीर संगदिल की भी आँखें नम करने को काफी हैं।
    ऑक्सीजन नहीं, इंजेक्शन नहीं, दवाई नहीं, बिस्तर नहीं, अस्पताल नहीं के बाद लाश बनी जिंदगी को फिर भी सुकून नहीं मानो परीक्षा अब शुरू हुई हो, कांधे पर अपनों को खोकर संभाले भटकते लोगों को कारवां कब्रिस्तान श्मशान की तलाश में हताश घूम रहा है, माटी-माटी में मिलाने की आखिरी रस्म जो छूट गए उनका पीछा छोड़ती नज़र नहीं आ रही है। कतारों में पड़े शव, अग्नि के इंतजार में लाश, जलाने की आस में परिजन, निराश रिश्तेदार, हताश व्यवस्था जिंदगी के बाद भी जिस्म का पीछा छोड़ने को राजी नहीं। मानो दर्द का दरिया बह रहा है, पीड़ा की बयार, आँसुओं की बरसात और फिजाओ में गम का मातमी गीत गूंज रहा है।
    ऐसा नहीं कि सब काल के गाल में समा ही रहे हैं, बचने वाले भी बहुत हैं बचाने वाले भी रात दिन मौत के मुँह से जिंदगी छीनने में जुटे ही हैं। डॉक्टर नर्स पुलिस स्वास्थ्यकर्मी सामाजिक संस्थान सब संयम साधना को सरोकार कर उपकार में लगे हैं। अब सेना ने भी मोर्चा संभाल लिया है प्राणवायु ले पवन दूत के रूप में जहाज उड़ चले हैं, मालगाड़ी प्राण गाड़ी बन रेल की पटरियों पर दौड़ रही है, उद्योगपतियों ने उद्योग धन पतियों ने तिजोरी खोल समाज को समर्पित कर ज़िन्दगी बचाने में ज़िन्दगी झोंक दी है। नमन सबको जो महामारी में उम्मीद का सूरज बन चमक रहे हैं। जिंदगी मायने बता रही है, जिंदगी खुद को समझा रही है, जिंदगी डरा रही है और जो डर रहे हैं वो ही बच भी रहे हैं वक्त आलोचना का नही प्रार्थना का है। दुआओं में जब सब हाथ छोड़ जाएंगे यकीन है दर्द का यह तूफां भी ठहर जाएगा। आओ भरोसा दें, भरोसा बने, भरोसा करें और मिलकर लड़ें हम आस तलाश लाश हताश इन बेरहम शब्दों से।

संदीप मिश्र

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